स्कूल का पहला प्यार: एक अधूरी मगर खूबसूरत दास्तां
स्कूल की वो सफेद यूनिफॉर्म, कंधों पर भारी बस्ता और दिल में ढेरों सपने—यही तो होती है स्कूल लाइफ। लेकिन इस भागदौड़ भरी जिंदगी में एक चीज़ ऐसी होती है जो हमेशा के लिए हमारे दिल के किसी कोने में ठहर जाती है, और वो है “स्कूल का पहला प्यार”।
मेरी कहानी भी कुछ अलग नहीं थी। 10वीं क्लास की वो बरसात वाली सुबह मुझे आज भी याद है। क्लास में शोर मचाते लड़कों के बीच जब वो पहली बार अपनी नीली आंखों और सादगी भरे चेहरे के साथ अंदर आई, तो जैसे सब कुछ थम सा गया। उसका नाम था ‘सपना’, और सच कहूँ तो वो मेरे लिए किसी सपने जैसी ही थी।
शुरुआत में तो बस छुप-छुपकर उसे देखना ही मेरा दिन बना देता था। कभी कैंटीन में उसे समोसे खाते देखना, तो कभी असेंबली में उसकी लाइन के पीछे खड़े होना। वो एहसास इतना मासूम था कि मुझे उससे कुछ कहने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई। बस उसे देखना ही काफी था।
धीरे-धीरे हमारी दोस्ती हुई। वो केमिस्ट्री के नोट्स माँगने के बहाने मेरे पास आती और मैं, जो खुद पढ़ाई में कच्चा था, उसके लिए रात-रात भर जागकर नोट्स तैयार करता। वो हँसी, वो छोटी-छोटी बातें और स्कूल की छुट्टी के बाद साइकिल पर साथ घर जाना—यही तो असली सुकून था।
लेकिन जैसा कि अक्सर कहानियों में होता है, स्कूल खत्म हुआ और रास्ते बदल गए। विदाई (Farewell) के दिन हम दोनों की आँखों में आंसू थे, पर जुबां पर कोई वादा नहीं। हम जानते थे कि आगे की पढ़ाई और करियर हमें अलग कर देंगे।
आज कई साल बीत गए हैं, मैं अपनी लाइफ में सेटल हूँ, शायद वो भी होगी। लेकिन जब भी बारिश होती है या मैं किसी स्कूल की बस को गुज़रते देखता हूँ, तो चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती है। स्कूल का पहला प्यार भले ही मुकम्मल न हो, लेकिन वो हमें इंसानियत और भावनाओं की गहराई ज़रूर सिखा जाता है।

