Meenu love story

एक ऐसी मुलाक़ात , village love story

एक ऐसी मुलाक़ात, जिसने दो दिलों की दुनिया हमेशा के लिए बदल दी।

गर्मी के दिन थे, लेकिन गाँव की हवा में एक अजीब-सा सुकून था। शहर की भाग-दौड़ से थका हुआ आरुष जब नवरंगपुर पहुँचा था, तो उसे लगा था कि यह गर्मियाँ भी बाकी गर्मियों की तरह बोरिंग ही गुजरेंगी। वही पुराना घर, वही पुराने लोग, वही एक-सा माहौल। पर उसे क्या पता था कि इस बार कुछ ऐसा होने वाला है, जो सिर्फ उसकी गर्मियाँ ही नहीं बल्कि पूरी जिंदगी बदल देगा। यह कहानी शुरू होती है एक ऐसी मुलाक़ात से, जिसकी उसने कभी उम्मीद भी नहीं की थी।

भारत के पारंपरिक गाँवों की सादगी को अगर गहराई से समझना हो तो

गाँव में सुबहें अलग तरह की होती हैं। मुर्ग़े की बाँग, गायों की घंटियाँ, और मिट्टी की वह कच्ची खुशबू… जो शहर की किसी भी एयर फ्रेशनर में नहीं मिलती। पर उस सुबह, जब वह दादा के पुराने आँगन में बैठा चाय पी रहा था, उसे इस सब में कोई खास अच्छाई महसूस नहीं हो रही थी। उसे बस शहर वाली जिंदगी याद आ रही थी। कालेज, दोस्तों की हंसी, और मोबाइल फोन की आवाज़ें। यहाँ सब कुछ धीमा था, ठहरा हुआ। वो खुद से भी पूछ रहा था—“मैं यहाँ क्या ही करूँगा इतने दिनों तक?”

लेकिन जिंदगी अक्सर उस वक्त सबसे बड़ा मोड़ देती है, जब इंसान सोच ही रहा होता है कि कुछ नहीं बदलने वाला… और वो मोड़ कभी-कभी एक ऐसी मुलाक़ात के रूप में सामने आता है, जो सब बदल देती है।

, जब धूप थोड़ी हल्की हो चुकी थी, वह बिना किसी वजह के बाहर निकल पड़ा। शायद आदत थी—शाम होते ही टहलने की। गाँव की पगडंडियाँ वैसे की वैसे ही थीं, जैसे बचपन में थीं। मिट्टी की, सँकरी, दोनों तरफ जंगली फूलों से भरी हुई। वह चलते-चलते उसी पुराने कुएँ तक पहुँच गया, जहाँ बचपन में वह अपने दादा के साथ आता था।

वहीं उसने पहली बार उसे देखा।
और उसी पल उसे महसूस हुआ कि यह सिर्फ एक साधारण पल नहीं… बल्कि एक ऐसी मुलाक़ात है जो दिल में जगह बना लेगी।

एक लड़की, जो पानी भर रही थी। हवा बार-बार उसके दुपट्टे को उड़ा देती, और वह हर बार मन ही मन झुंझलाती हुई उसे सँवारती। उसकी चाल में कोई दिखावा नहीं था, न कोई बनावटीपन। वह जैसे अपनी ही दुनिया में थी। धूप उसके चेहरे पर गिरती और उसका रंग और भी साफ दिखने लगता, जैसे बरसात में धुला हुआ कोई सफेद आकाश।

आरुष के कदम उस पल रुक गए। उसे समझ नहीं आया कि वह क्यों रुक गया—शायद लड़की की शांति की वजह से, शायद उसकी आँखों में छिपी मासूमियत की वजह से, या शायद इसलिए क्योंकि इतने दिनों में उसने किसी को इतनी सादगी से जीते हुए नहीं देखा था। उस पल उसे महसूस हुआ कि यह कोई आम दृश्य नहीं था… यह एक ऐसी मुलाक़ात थी जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

लड़की ने पानी भरा, बाल्टी उठाई… थोड़ी सी लड़खड़ाई… पर फिर संभल गई। वह उसके पास जाकर मदद कर सकता था, लेकिन उसके चेहरे पर जो आत्मविश्वास था, उसने उस कदम को रोक दिया। लड़की को शायद मदद की आदत ही नहीं थी; वह खुद ही अपना बोझ उठाने की आदी थी।

वह चलने लगी। पगडंडी पर धूल उड़ी। चार कदम बाद उसने हल्का सा सिर घुमाया—शायद उसे लगा कोई पीछे है। उनकी नज़रें मिलीं।

जैसे वक्त उस पल एक सेकंड के लिए ठहर गया हो।

वो नज़र अनजान थी, पर अजनबी नहीं।
जैसे बस दो पल में दोनों एक-दूसरे की कहानी में दाखिल हो गए हों।
जैसे यह सचमुच एक ऐसी मुलाक़ात हो जिसमें हजार बातें बिना बोले कह दी जाती हैं।

लड़की मुड़ी और आगे बढ़ गई।
पर उसकी चाल के बाद भी उसकी मौजूदगी वहीं कुएँ के पास तैरती रह गई।

आरुष देर तक खड़ा रहा। वह पहली मुलाकात थी, पर दिल में इतना असर छोड़ गई थी कि घर लौटने के बाद भी वह उसी चेहरे को याद करता रहा। रात को भी नींद देर से आई, और जब आई, तो उसी कुएँ वाली पगडंडी का सपना लेकर आई—मानो दिल कह रहा हो कि यह सिर्फ शुरुआत है… एक ऐसी मुलाक़ात की शुरुआत।

अगले दिन वह खुद को रोक नहीं पाया।
वह उसी वक्त कुएँ के पास पहुँच गया, जहाँ उसने उसे देखा था।

पर वह वहाँ नहीं थी।

दूसरे दिन भी नहीं।
तीसरे दिन भी नहीं।

उसके मन में एक अजीब-सी बेचैनी होने लगी।
क्यों हो रही थी—उसका कोई कारण वह खुद भी नहीं समझ पा रहा था।

पाँचवें दिन आखिरकार वह वहीं थी।

वही पगडंडी।
वही कुआँ।
वही लड़की।

हवा आज कुछ ज़्यादा ही शरारती थी। उसके बालों को बार-बार उड़ा रही थी, और वह चिढ़कर उन्हें कान के पीछे कर रही थी। इस बार पानी भरते समय उसकी पकड़ थोड़ी डगमगाई और पानी छलक कर नीचे गिर गया।

आरुष ने पहली बार हिम्मत दिखाते हुए कहा—
“मैं उठा दूँ?”

लड़की ने सिर उठाया। उसकी आँखों में हैरानी थी, पर घबराहट नहीं।
वह बस बोली—
“नहीं… आदत है मेरी।”

और वह धीरे से मुस्कुराई।
वो मुस्कान छोटी थी, पर सच थी।

यह पहली बार था जब उसने उसकी आवाज़ सुनी थी।
धीमी, साफ, और एक अजीब-सी अपनापन लिए हुए।

लड़की बाल्टी लेकर चल दी।
लेकिन जाते-जाते उसने एक पल को रुककर उसे देखा।
वो छोटा-सा पल…
यही वह जगह थी जहां कहानी की पहली सांस जन्मी।

आरुष के कदम खुद-ब-खुद उसके पीछे उठने लगे, पर वह रुका रहा। उसे महसूस हुआ कि यह एक अलग तरह की मुलाकात है—धीमी, सरल, पर दिल पर असर छोड़ देने वाली।

वह घर लौटा, लेकिन अब गाँव उसे बोझ नहीं लग रहा था।
अब कुछ था जो उसे बाँधे हुए था—
या शायद कोई थी।

उस शाम के बाद आरुष के अंदर एक अजीब-सी हलचल रहने लगी थी। वह खुद को समझा नहीं पा रहा था कि आखिर एक अनजान लड़की उसे इतनी क्यों खींच रही है। शायद इसलिए कि वह अब तक जिनसे मिला था, उनमें किसी में भी वह सादगी नहीं थी। शहर की लड़कियाँ बहुत कुछ बोलती थीं—अपनी पसंद, नापसंद, ग़ुस्सा, मज़ाक, सब कुछ। पर यह लड़की… यह बोलती ही नहीं थी, फिर भी उसका हर छोटा हावभाव बहुत कुछ कह जाता था।

अगले कुछ दिनों तक उसने कोशिश की कि वह उससे दोबारा बात करे। पर हर बार जब वह कुएँ के पास पहुँचता, लड़की या तो जल्दी में होती या वहाँ होती ही नहीं। उसकी यह अनिश्चित मौजूदगी आरुष को बेचैन भी करती और किसी अजीब-सी उम्मीद से भर भी देती।

एक दिन दोपहर में वह खेतों के रास्ते से गुजर रहा था जब उसे दूर से वही दुपट्टे का हल्का-सा गुलाबी रंग चमकता दिखाई दिया। इस बार वह कुएँ पर नहीं थी। वह खेत के किनारे बैठकर कुछ चुन रही थी—शायद सब्ज़ी के पत्ते, या जंगली मेथी। वह इतनी मग्न थी कि उसे अपनी तरफ आते कदमों की आवाज़ तक सुनाई नहीं दी।

आरुष कुछ कदम दूर रुक गया। हवा में मिट्टी की महक थी, और कहीं दूर से बैलों की घंटियों की आवाज़ आ रही थी। उसने हिम्मत करके कहा—

“तुम… कुएँ पर नहीं आई आज?”

लड़की ने चौंककर सिर उठाया। उसकी आँखों में वही गहराई थी, वही शांत एहसास। उसने कुछ पल उसे देखा, जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हो कि यह वही लड़का है या कोई और। फिर उसने बस सिर हिलाकर कहा—

“घर में काम था।”

बात छोटी थी, पर उसके पीछे सौ बातें छिपी थीं।
वह लड़की ज्यादा बोलने वाली नहीं थी।
लेकिन उसका हर शब्द जैसे दिल पर सीधे उतर जाता था।

आरुष ज़मीन पर बैठ गया, थोड़ी दूरी बनाकर। उसने कहा—

“तुम रोज़ यहीं आती हो?”

लड़की ने फिर सिर हिलाया—हाँ में।

“नाम क्या है तुम्हारा?”
आरुष ने पूछा।

लड़की ने हल्की-सी झिझक के बाद जवाब दिया—

“संजीवनी।”

उसके होंठों पर यह नाम सुनते ही जैसे समय थोड़ा रुक गया।
संजीवनी—एक अजीब-सा प्यारा सा नाम।
अनसुना, ख़ास, और लड़की की तरह ही शांत।

“अच्छा नाम है,”
आरुष ने मुस्कुराकर कहा।

लड़की ने कुछ नहीं कहा, बस अपने पत्ते चुनने में लग गई।
लेकिन उसकी उंगलियों की चाल में एक लय थी, जैसे वह काम करते-करते सोचती भी जा रही हो।

कुछ मिनट खामोशी रही।
पर यह खामोशी बोझ नहीं थी—दो लोगों के बीच की एक नरम-सी हवा थी, जो बिना बोले भी बहुत कुछ कहती थी।

आरुष अचानक बोला—

“तुम शहर नहीं गई कभी?”

संजीवनी ने हल्के से मुस्कुराया।
“गाँव से ही फुर्सत नहीं मिलती, शहर क्या जाऊँगी?”

उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी।
बस एक सच्चाई थी—सीधी और सादगी भरी।

“मुझे लगता है, तुम शहर जाओगी तो सबको पागल कर दोगी,”
आरुष हँसकर बोला।

संजीवनी ने उसे एक पल देखा…
फिर अपनी नज़र झुका ली।
उसके गाल थोड़ा-से लाल हो गए थे—शायद धूप से, शायद तारीफ़ से।

वह लड़कियों में से नहीं थी जो तारीफ़ पर तुरंत मुस्कुरा दे या मज़ाक कर दे।
पर उसके चेहरे में एक छोटी-सी चमक आ गई थी, जो बताती थी कि उसे यह बात बुरी नहीं लगी।

कुछ देर बाद उसने पत्तों की छोटी-सी गठरी बाँधी, और उठने लगी।
आरुष ने पूछा—

“मैं मदद कर दूँ?”

इस बार वह मुस्कुराई।
“नहीं… आदत है मेरी,”
वही पुराना जवाब, लेकिन इस बार उसके लहज़े में नरमी थी।

वह चलने लगी।
आरुष भी धीरे-धीरे उसके पीछे चलता रहा, पर थोड़ी दूरी पर।
वह गाँव के मोड़ पर पहुँची और मुड़कर अपनी कच्ची गली में चली गई।
लेकिन इस बार उसने मोड़ पर एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा—
बहुत हल्का-सा, पर साफ।
जैसे वह कह रही हो—
“तुम आ सकते हो… लेकिन दिल से, ज़बरदस्ती से नहीं।”

उस दिन के बाद दोनों की मुलाकातें थोड़ी बढ़ गईं।
कभी कुएँ पर, कभी खेत में, कभी रास्ते में।
संजीवनी अब भी कम बोलती थी, पर उसकी कम बोलने की आदत भी अब प्यारी लगने लगी थी।

वह आरुष से ज़्यादा नहीं पूछती थी, लेकिन जब भी पूछती—सही पूछती।
जैसे एक दिन उसने बिना किसी वजह कहा—

“शहर में तुम लोग इतना भागते क्यों हो?”
आरुष हँस पड़ा।
“क्योंकि हम गाँव की तरह स्लो नहीं जी पाते।”

संजीवनी ने सिर हिलाया।
“धीमी चीज़ें भी अच्छी होती हैं।”

उसकी वह बात आरुष के दिल में कहीं गहरी उतर गई।
क्योंकि आज तक उससे किसी ने ऐसा नहीं कहा था।
शहर में सब तेज़ थे—बातें, फैसले, ज़िंदगी।
पर यहाँ एक लड़की थी जो कह रही थी कि धीमी चीज़ें भी खूबसूरत होती हैं…

संजीवनी की यही बातें उसे अलग बनाती थीं।
वह कम बोलती थी, पर जब बोलती थी, बस दिल में उतर जाती थीं।

गाँव का मौसम बदल रहा था।
शामें ठंडी होने लगी थीं।
और शायद… कहीं न कहीं कुछ और भी बदल रहा था।

अब आरुष को गाँव खाली नहीं लगता था।
संजीवनी की मौजूदगी ने उस खालीपन को भरना शुरू कर दिया था।
लेकिन उसका मन जानता था कि यह सब इतना आसान नहीं है।
क्योंकि शहर की जिंदगी और गाँव की सादगी—ये दोनों एक-दूसरे से बहुत अलग होती हैं।

और सबसे बड़ी बात—
उसे नहीं पता था कि संजीवनी उसके बारे में क्या सोचती है।
वह हँसती थी, कभी-कभी नज़रें मिलाती थी, बात भी करती थी,
पर क्या ये सब सिर्फ एक सामान्य व्यवहार था?
या उसके दिल में भी वही हलचल थी जो आरुष महसूस कर रहा था?

यह सवाल उसके मन में हर दिन बढ़ता जा रहा था।
पर किसी से पूछ नहीं सकता था—
ना संजीवनी से,
ना खुद से।

दिन बीतते गए और दोनों की मुलाक़ातें धीरे-धीरे एक छोटी-सी आदत बनने लगी थीं। संजीवनी कितनी भी चुप रह ले, लेकिन जब भी आरुष आता, उसकी आँखों में एक हल्की-सी चमक आ जाती थी। वह इसे छिपाने की कोशिश करती, पर आँखें कभी झूठ नहीं बोलतीं। आरुष भी अब उसके आस-पास अपने-आप बदल जाता था। शहर में वह तेज़ बोलने वाला, हँसमुख और थोड़ी शरारती फितरत का लड़का माना जाता था, लेकिन यहाँ… यहाँ वह शांत हो जाता था। जैसे उसकी बातों की रफ्तार भी पगडंडियों की चाल से मिल गई हो।

एक दोपहर दोनों अचानक कुयें के पास आ मिले। संजीवनी वहाँ पहले से थी, और वो धीमे-धीमे पानी भर रही थी। धूप आज थोड़ी कम थी और हवा भी कुछ ठंडी-सी चल रही थी। आरुष ने आते ही कहा—

“आज पानी कम लग रहा है कुयें में?”

संजीवनी ने सिर झुकाकर पानी में देखा, फिर बोली—
“बरसात देर से आए तो ऐसा ही होता है। गाँव में सबकुछ आसमान पर चलता है।”

“और शहर में?”
उसने मुस्कुराकर पूछा।

“शहर में शायद दिल आसमान पर चलते हैं, पर लोग नहीं,”
वह धीरे से बोली।

आरुष हँसा, पर मन में उसकी बात कहीं गहराई तक बस गई।
संजीवनी को पता नहीं था कि उसकी हर बात जैसे सीधी आरुष के दिल पर रख गई चोट की तरह याद रह जाती थी।
वह कम बोलती थी, पर वह कम बोलना इतना गहरा था कि शहर की लंबी-लंबी बातें भी उसके आगे फीकी लग जाती थीं।

आज आरुष ने पहली बार उसे थोड़ा ध्यान से देखा था—धूप में उसके हाथ थोड़े रूखे लगे, शायद रोज़ खेत और काम के कारण। उसके पैर मिट्टी से भरे हुए थे। उसके कपड़े बहुत साधारण थे, पर एक सलीके से पहने हुए। वह किसी तरह का दिखावा नहीं करती थी, और यही बात उसे खूबसूरत बनाती थी।

आरुष को याद आया कि उसने कभी संजीवनी को अपने बारे में ढंग से बताया ही नहीं था।
वह बोला—
“तुम मेरे बारे में कुछ पूछना नहीं चाहती?”

संजीवनी पानी की भरी हुई बाल्टी रखते हुए बोली—
“पूछूँगी… जब जरूरत लगेगी।”

उसका यह जवाब आरुष को इतना सीधा लगा कि वह कुछ पल चुप रह गया।
शहर में लोग अक्सर जल्दी-जल्दी सब जान लेने की कोशिश करते हैं—नाम, पढ़ाई, सब।
पर वह लड़की… वह सब समय पर छोड़ देने वाली थी।

कुछ देर बाद दोनों पगडंडी पर चलने लगे। हवा हल्की थी और सूरज ढलने को था।
चलते हुए अचानक संजीवनी ने पूछा—
“शहर से आए हो… वहाँ वापस कब जाओगे?”

यह सवाल सीधा था, और आरुष उस सवाल के लिए तैयार नहीं था।
वह कुछ पल रुक गया।
“अभी… कुछ दिन हैं। इतनी जल्दी नहीं।”

“हम्म…”
वह बस इतना ही बोली।

लेकिन उसकी आँखों में कुछ था—
कुछ ऐसा जो आरुष ने पहली बार महसूस किया।
जैसे उसे इस बात से फर्क पड़ रहा था कि वह कब जाएगा।
जैसे उसकी मौजूदगी अब उसके लिए भी मायने रखती थी।
लेकिन संजीवनी ने चेहरा मोड़ लिया, ताकि उसकी आँखों की सच्चाई बाहर न आ सके।

मोड़ पर पहुँचकर उसने कहा—
“मैं घर जा रही हूँ।”

और हमेशा की तरह वह धीरे-धीरे चलने लगी।
पर आज उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
शायद वह अपने ही दिल को छिपा रही थी,
शायद वह नहीं चाहती थी कि उसकी कमजोरी किसी को दिखे,
या शायद… वह खुद ही डर गई थी कि उसके दिल में कुछ ऐसा हो रहा है,
जो वह समझ नहीं पा रही थी।

उधर, आरुष वहीं खड़ा रह गया।
उसे लगा आज की संजीवनी कुछ अलग थी।
थोड़ी बेचैन, थोड़ी उलझन में, और थोड़ी डरती हुई।
उसे नहीं पता था कि इसे कैसे समझे।
किसी लड़की का दिल पढ़ना आसान नहीं होता,
और संजीवनी जैसी चुप लड़की का दिल पढ़ना तो और भी मुश्किल।

शाम को घर पहुँचकर दादी ने पूछा—
“कहाँ-कहाँ घूम रहे हो आजकल?”

आरुष मुस्कुरा दिया।
“बस… ऐसे ही।”

दादी ने उसे कुछ पल देखा, फिर हँस दीं।
“किसी की वजह से मुस्कान बदली है तुम्हारी।”

वह चौंक गया।
“कौन?”

दादी बोलीं—
“जिन लड़कों पर गाँव की हवा असर करती है… वो ऐसे ही मुस्कुराते हैं।”

उसका मन थोड़ा झेंप गया।
दादी की नजरें तेज थीं।
पर वह इतनी आसानी से कुछ नहीं बताने वाला था।

रात को उसे नींद देर से आई।
वह बार-बार सोचता रहा—
क्या संजीवनी उसे पसंद करने लगी है?
क्या उसकी आँखों का वो बदलता रंग इसी वजह से था?
या कहीं यह बस उसका भ्रम था?

अगली सुबह वह कुएँ की तरफ गया,
पर वहाँ कोई नहीं था।

दोपहर में खेतों की तरफ गया,
पर वहाँ भी कोई नहीं।

शाम को पाँच बजे के करीब वह तीसरी बार उससे टकरा गया,
जैसे किस्मत कह रही हो—
“तुम दोनों अभी खत्म नहीं हुए हो। कहानी अभी बाकी है।”

संजीवनी इस बार अकेली नहीं थी।
उसके साथ शायद उसकी छोटी बहन थी,
जो हँसते हुए उछल-कूद कर रही थी।
संजीवनी उसे पकड़े हुए थी,
पर उसकी आँखें एक पल के लिए आरुष की तरफ उठीं…
और उस एक पल में सब कुछ था—
शर्म, दूरी, अपनापन… और एक अजीब-सा खिंचाव।

छोटी बहन ने मासूमियत से पूछा—
“दीदी, ये कौन है?”

संजीवनी झेंप गई।
“कोई नहीं… बस गाँव में रहता है।”

आरुष को ये “कोई नहीं” सुनकर हल्की-सी चुभन हुई,
पर उसने मुस्कुरा कर सिर हिला दिया।
“हाँ, मैं बस… ऐसे ही हूँ।”

छोटी बहन खिलखिलाकर हँसने लगी।
“दीदी झूठ बोल रही है। दीदी इस लड़के को देख कर मुस्कुराती हैं!”

संजीवनी का चेहरा लाल हो गया—
शायद धूप से ज़्यादा शर्म से।

वह जल्दी से बोली—
“चुप कर! चल घर चलते हैं।”

वह अपनी बहन का हाथ पकड़कर तेज़ी से आगे चलने लगी।
लेकिन आधे रास्ते पर रुककर…
धीरे से पीछे मुड़कर आरुष की तरफ देखा।

इस बार उसकी आँखों में शर्म नहीं थी।
इस बार उसमें स्वीकार का एक छोटा-सा कण था—
जैसे वह कह रही हो…

“हाँ… तुम मेरे लिए कोई नहीं नहीं हो।”

और फिर वह चल दी।

उस पल आरुष को पहली बार महसूस हुआ कि यह कहानी अब सिर्फ उसकी नहीं रही।
अब इसमें दो दिल शामिल थे।
दो दुनियाएँ।
दो उम्मीदें।

और शायद…
दो डर भी।

क्योंकि जो मोहब्बत धीरे-धीरे पनपती है,
वो अक्सर सबसे गहरी होती है—
और सबसे ज्यादा दर्द वही देती है।

भाग 2 पढ़े  जब दो दिलों ने एक-दूसरे को पा लिया था, पर किस्मत ने साथ नहीं छोड़ा।

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