कॉलेज लाइफ—बस नाम सुनते ही न जाने कौन-कौन सी यारियां, मस्ती, टेंशन और क्रश की यादें दिमाग में घूमने लगती हैं। स्कूल का आखिरी दिन… एकदम फिल्मी सीन! बंदा किताबों-ड्रेस से टाटा-बाय बाय करता है, और फिर एकदम नई दुनिया—कॉलेज। दिल में एक्साइटमेंट का बम फूटता है, साथ में थोड़ा डर भी, कहीं खो न जाएं या कोई सीन न बन जाए।
पहली बार जब अपने इंजीनियरिंग कॉलेज की दहलीज लांघी थी, मुंह पर तो फुल स्माइल थी, पर अंदर से दिमाग का CPU ओवरलोड—क्या यहां अपने जैसे लोग मिलेंगे? प्रोफेसर कितने खतरनाक होंगे? यहां फिट हो पाऊंगा या नहीं? क्लास के अंदर घुसा तो सबके चेहरे वैसे ही हिले-मिले, डरपोक से। अरे, ये सब भी मेरी ही तरह टेंशन में हैं—ये सोचकर थोड़ा कूल फील हुआ, जैसे किसी सीक्रेट क्लब में आ गया हूं।
शुरुआती दिन? भाई, पूरा झोल। सुबह-सुबह क्लासरूम खोजते-खोजते पैर दुख जाते थे। प्रोफेसर के नाम याद रखने में तो जैसे दिमाग की बत्तियां गुल। लाइब्रेरी कार्ड बनवाने की लाइन, आईडी कार्ड के लिए धक्कामुक्की, और कैंटीन की दस रुपए वाली चाय—वहीं से असली कॉलेज लाइफ की शुरुआत हो जाती है। धीरे-धीरे वही अजनबी जगह अपना दूसरा घर बन जाती है।
अब असली खजाना—दोस्ती। कॉलेज में सगे रिश्तेदार तो दूर, पर दिल से जुड़े यार मिल जाते हैं। मेरी लाइफ में रवि और तन्वी—ये दो कैरेक्टर आए। रवि—रात के 2 बजे भी फोन करो, बंदा हाजिर। तन्वी—मेरी गाइड, लाइफ कोच, फुल सपोर्ट सिस्टम। ये तीनों मिलकर कैंटीन में ऐसे बैठते, जैसे UN मीटिंग हो रही हो। ग्रुप स्टडी का बहाना, असल में गॉसिप और मस्ती। एग्जाम से एक रात पहले सब के सब पागल हो जाते, लेकिन फिर भी पास हो जाते थे, पता नहीं कैसे!
और हां, कॉलेज में पहली बार दिल का डगमगाना—अरे, वो भी फुल ड्रामा! मेरी लाइफ में थी निधि। पहले तो बस नाम जानते थे, फिर प्रोजेक्ट के बहाने दोस्ती हुई। धीरे-धीरे उसकी मुस्कान में ही सुकून मिलने लगा। घंटों बेंच पर बैठकर बस बातें, चाय, और लाइब्रेरी में किताबें कम, एक-दूसरे को निहारना ज्यादा। पर क्या करें, लाइफ हमेशा हमारी स्क्रिप्ट फॉलो नहीं करती। करियर, फैमिली, जिम्मेदारियां—आखिर में रास्ते अलग हो गए। कभी-कभी चैट हो जाती है, लेकिन अब वो रिश्ता बस यादों में ही जिंदा है।
मस्ती के साथ असली जंग भी तो यहीं शुरू होती है। खर्चे खुद उठाने पड़े, तो मैंने ट्यूशन पकड़ ली। जेब खाली रहती थी, कई बार दोस्त आउटिंग के लिए बुलाते, मना करना पड़ता—शुरू में बुरा लगा, बाद में सब समझ गए। इंटर्नशिप का झंझट, प्लेसमेंट की टेंशन, रिजेक्शन का कड़वा घूंट—इन सब के बारे में इंस्टा स्टोरी तो कोई नहीं डालता, लेकिन यही चीजें इंसान बना देती हैं। मैं भी कई बार फेल हुआ, पर हर बार फिर से खड़ा हुआ।
क्लासरूम के बाहर असली लाइफ थी। डिबेट क्लब जॉइन किया तो समझ आया, कब बोलना है और कब चुप रहना है। नाटक मंडली में सीखा—हर कोई लाइफ का अपना रोल प्ले कर रहा है। इन एक्टिविटीज ने मुझे वो सिखाया, जो कोई बुक नहीं सिखा सकती थी।
सबसे बड़ा लेसन—हार मानना आसान, लेकिन कोशिश करते रहना असली बाज़ी है। आलोचना सुननी सीखी, अपनी गलती मानकर खुद को सुधारा।
फिर आया फेयरवेल वाला दिन—सब हंस रहे थे, पर आंखों में पानी था। दिल में फ्लैशबैक चालू—पहला दिन, पहली क्लास, पहला क्रश, पहली हार, पहली जीत, और आखिरी अलविदा। एक-दूसरे से वादा किया—कॉन्टैक्ट में रहेंगे, लेकिन लाइफ की भागदौड़ में सब फिका पड़ जाता है। फिर भी, दिल में वो कैंटीन, वो दोस्त, वो क्लासरूम—आज भी ताजा हैं, जैसे कल की बात हो।
कहने को कॉलेज लाइफ खत्म, लेकिन सच्ची में ये कभी खतम नहीं होती। हर याद, हर सीख, हर रिश्ता ज़िंदगी के सफर में हमेशा साथ चलता है। आज अगर खुद पर भरोसा है, तो उसकी जड़ वहीं है—कॉलेज के उन सुनहरे दिनों में।
बाकी सब जाए भाड़ में—कॉलेज लाइफ, तू हमेशा दिल में जिंदा है!

Very nice story