पहली नज़र का प्यार
जब ज़िंदगी ने पहली बार मोहब्बत का एहसास करवाया
कॉलेज का पहला दिन था। नई यूनिफॉर्म, नए चेहरे, नए रास्ते और एक बिल्कुल नया माहौल।
दिल में एक अजीब-सा उत्साह था, मानो ज़िंदगी आज अपना एक नया पन्ना खोलने वाली हो।
गेट के बाहर कदम रखते ही हवा का हल्का-सा झोंका चेहरे से टकराया, जैसे किसी ने धीरे से फुसफुसाकर कहा हो—
“आज तुम्हारी ज़िंदगी बदलने वाली है… क्योंकि पहली नज़र का प्यार तुम्हें मिलने वाला है।”
शुरुआती हलचलें—भीड़, शोर और अनजान रास्ते
भारतीय कॉलेजों के पहले दिन की हलचल को समझना हो तो ये जगह बिल्कुल परफेक्ट थी।
भीड़ में हर कोई किसी को ढूँढ रहा था—
कोई क्लास, कोई अपनी नई दोस्ती, कोई अपनी पहचान।
मैं भी उसी भीड़ का हिस्सा था।
हाथ में बैग, कंधे पर सपनों का बोझ, और आँखों में वही चमक जो हर नए छात्र की होती है।
कॉरिडोर में students के ग्रुप बने हुए थे।
कहीं हँसी की आवाज़, कहीं चॉकबोर्ड की गंध,
कहीं seniors गाइड कर रहे थे, कहीं डराने की कोशिश कर रहे थे।
कैंपस की दीवारों पर नई पेंटिंग्स थीं,
और दूर किसी क्लास से आती गिटार की हल्की-सी धुन पूरे माहौल को खुशनुमा बना रही थी।
मैं अपनी क्लास का सेक्शन ढूँढ रहा था जब…
वो पल जब सब कुछ थम गया
भीड़ के बीच मेरी नज़र उस पर पड़ी—
और बाकी सब आवाज़ें, सारी हलचल अचानक थम सी गई।
वो सफेद सूट में थी,
हवा उसके बालों को हल्के से उड़ा रही थी,
और उसकी आँखों में इतनी मासूम चमक थी कि दिल बिना वजह धड़कने लगा।
मैं क्लास के बाहर खड़ा रोल नंबर देख रहा था कि तभी किसी ने पीछे से धीरे से कहा—
“Excuse me, क्या ये सेक्शन-B है?”
मैं पलटा— और वही थी।
वो पहली नज़र का पल… बस वहीं था।
उसकी आवाज़ इतनी हल्की और साफ़ थी कि पूरी भीड़ जैसे गायब हो गई।
मैंने धीरे से जवाब दिया—
“हाँ… सेक्शन-B ही है।”
उसने हल्की मुस्कान दी, और यकीन मानो, उस मुस्कान ने मेरे अंदर कुछ बदल दिया।
क्लास की पहली मुलाक़ात—लेकिन दिल पहले ही हार गया था
लेक्चर शुरू हो गया था, पर मेरा ध्यान बिल्कुल भी किताबों पर नहीं था।
वो बायीं तरफ बैठी थी, और मैं दायीं तरफ।
अचानक नहीं—धीरे-धीरे—उसकी मौजूदगी मेरे दिन का हिस्सा बनने लगी।
लेक्चरर की आवाज़ कभी-कभी सुनाई देती,
पर मेरा ध्यान उसके बालों पर, उसकी उंगलियों की चाल पर,
और उसकी शांति पर ज्यादा था।
मुझे खुद समझ नहीं आ रहा था कि मैं ऐसा क्यों महसूस कर रहा हूँ।
शायद ये पहली बार था जब दिल ने दिमाग को चुप कर दिया था।
भारत के पारंपरिक गाँवों की सादगी को अगर गहराई से समझना हो तो
छोटी-छोटी बातें, जो मोहब्बत को जन्म देती हैं
दिन गुजरते गए।
कभी लाइब्रेरी में किताबें लेते हुए मुलाक़ात,
कभी कैंटीन में चाय की कतार में खड़े होना,
कभी क्लास के बाहर नोट्स मांगना।
वो जब भी मुस्कुराती, मुझे लगता सारी दुनिया रौशन हो गई है।
उसकी मुस्कान में कुछ ऐसा था जो सीधे दिल को छू जाता था।
एक दिन लाइब्रेरी के बाहर उसकी किताबें गिर गईं।
मैंने तुरंत उठाने में मदद की।
वो मुस्कुराई और मज़ाक में बोली—
“इतनी fast मदद कर रहे हो… कहीं पहली नज़र का प्यार तो नहीं?”
मैं हँस पड़ा—
“अगर हो भी… तो इसमें बुरा क्या है?”
उसने झेंपकर नज़रें झुका लीं।
उस पल में भी एक अलग ही मिठास थी।
बारिश की शाम—कुछ एहसास शब्दों से बड़े होते हैं
बारिश हो रही थी।
कॉलेज के पेड़ों से पानी टपक रहा था,
जमीन पर छोटे-छोटे पानी के गड्ढे बन चुके थे।
वो कैंटीन के पास खड़ी थी, बालों से पानी झटक रही थी।
मैं कुछ पल बस उसे देखता रह गया।
वो बोली—
“मुझे बारिश में चलना बहुत पसंद है।”
मैंने कहा—
“तो आज बिना छाते के चलें?”
वो मुस्कुराई—
और वो मुस्कान आज भी याद है।
हम दोनों बारिश में चले,
धीरे-धीरे बातें करते हुए,
छोटे-छोटे पलों को जीते हुए।
उस शाम ने हमारे बीच की दूरी कम कर दी।
जैसे बारिश ने दो दिलों के बीच का रास्ता साफ़ कर दिया हो।
दोस्ती का गहराना… और एक अनकही मोहब्बत
हमारी दोस्ती धीरे-धीरे गहरी होती गई।
क्लास खत्म होने के बाद भी बातें खत्म नहीं होती थीं।
कभी कॉलेज की दीवारों पर बैठकर सपने देखते,
कभी लंबी बातें करते हुए रास्ता तय करते।
उसने एक दिन कहा—
“मुझे किसी अपने को खो देने का डर लगता है।”
मैंने धीरे से कहा—
“फिर मुझे मत खोना।”
वो कुछ नहीं बोली, बस हँस दी।
लेकिन उस हँसी में एक अपनापन था,
एक छुपा हुआ भरोसा,
और शायद… थोड़ा सा प्यार भी।
लेकिन ज़िंदगी हमेशा आसान नहीं होती
तीसरे सेमेस्टर में कुछ बदलने लगा।
वो कम मिलने लगी।
कॉल्स कम, messages कम… मुलाक़ातें लगभग न के बराबर।
मेरे अंदर बेचैनी बढ़ रही थी।
मैंने पूछा—
“कुछ बदल गया है क्या?”
वो बोली—
“नहीं… सब ठीक है।”
लेकिन उसकी आँखें वो सच नहीं कह पा रही थीं
जो दिल कह रहा था।
एक अधूरी बातचीत—एक अधूरा सवाल
एक शाम हम कॉलेज की बेंच पर बैठे थे।
हवा ठंडी थी, सूरज ढल रहा था।
मैंने हिम्मत करके कहा—
“अगर मैं कहूँ कि मैं तुम्हें पसंद करता हूँ… बहुत ज़्यादा…”
वो चुप रही।
लंबी खामोशी के बाद धीरे से बोली—
“मुझे भी तुम्हारे साथ रहना अच्छा लगता है…”
“…लेकिन कुछ बातें हैं जो मैं कह नहीं सकती।”
उसकी यह बात किसी चोट की तरह लगी।
ना हाँ, ना ना… बस एक अधूरा जवाब।
और उसी दिन से वो और दूर होती चली गई।
आख़िरी दिन—जब मोहब्बत और दूरी दोनों साथ खड़े थे
क्लास का आख़िरी दिन था।
सब फोटो ले रहे थे, हँसी-मज़ाक कर रहे थे,
लेकिन मैं बस उसे ढूँढ रहा था।
वो नहीं आई।
खाली क्लास में अकेले बैठकर,
खिड़की से गिरते गुलमोहर के फूलों को देखता रहा।
और तब एहसास हुआ—
कभी-कभी पहली नज़र का प्यार भी अधूरा रह जाता है।
लेकिन वो अधूरापन भी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत याद बन जाता है।
कुछ कहानियाँ पूरी नहीं होतीं,
लेकिन वो हमें अंदर से पूरा कर जाती हैं।
भारतीय कॉलेजों का माहौल कैसा होता है,
इसका एक अच्छा explanation यहाँ पढ़ सकते हैं:
और अब… कहानी आगे कहाँ जाएगी?
ज़िंदगी यहीं नहीं रुकी थी।
इस पहली नज़र के प्यार की कहानी में
अभी भी एक मोड़ बाकी था।
जो बातें वो नहीं बता पाई…
जो बातें मैंने पूछीं और उसने दिल में छुपा लीं…
उसका राज़, उसकी खामोशी —
सब कुछ Part-2 में खुलने वाला था।
