तेरी यादों का मौसम
कभी-कभी ज़िंदगी हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है जहाँ न आगे बढ़ने की हिम्मत होती है, न पीछे लौटने का साहस। मैं नहीं जानता कि मेरी कहानी इश्क़ की दास्तान है या किसी खामोश इंतज़ार की सज़ा, मगर इतना जानता हूँ कि उसने मुझे ज़िंदा रहकर भी अधूरा बना दिया।
उसका नाम सिया था — एक नाम जो अब सिर्फ़ यादों में बसता है, मगर जब भी सुनाई देता है, दिल की धड़कन कुछ पल को रुक जाती है। और मैं, अर्जुन, एक ऐसा इंसान जो कभी खुद पर भरोसा नहीं करता था, लेकिन उसे देखकर ज़िंदगी पर यकीन करना सीख गया।
वो किसी फिल्मी कहानी की तरह मेरी ज़िंदगी में नहीं आई थी। कोई तूफ़ान नहीं आया, कोई इंद्रधनुष नहीं दिखा — बस एक शाम, हवा में कॉफी की खुशबू थी और एक मुस्कान थी जिसने मेरी दुनिया बदल दी।
मैं उस दिन अकेला बैठा था, एक छोटे से कैफे में। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। हर बार की तरह मैं अपनी डायरी में कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था, मगर शब्द जैसे छिप गए थे। तभी दरवाज़े की घंटी बजी, और वो अंदर आई — सादगी में लिपटी एक अजनबी, जिसके चेहरे पर कुछ अनकहे सवाल थे।
वो आई, बैठी, और एक कप कॉफी ऑर्डर की। न जाने क्यों, उसकी आँखों में एक ठहराव था, जैसे वो किसी बहुत दूर की सोच में खोई हो। उसने मेरी ओर देखा — बस एक पल के लिए — और वो पल आज तक मेरी ज़िंदगी से गया नहीं।
हमारी नज़रें मिलीं, मगर कोई बात नहीं हुई। फिर भी उस खामोशी में एक एहसास था, जो शब्दों से कहीं ज़्यादा गहरा था।
वो दिन निकल गया, लेकिन उस एक मुलाक़ात ने मेरे भीतर कुछ बदल दिया। अगले दिन फिर मैं उसी वक्त उस कैफे में गया, और अजीब इत्तेफाक़ था कि वो भी आई। इस बार हमारी नज़रें थमीं, और उसने हल्की मुस्कान दी — बस उतनी सी बात, मगर उस मुस्कान ने मेरे दिन को नया अर्थ दे दिया।
धीरे-धीरे हमारी ये मुलाक़ातें बढ़ने लगीं। हम हर शाम वहीं मिलते — दो कॉफी कप, कुछ अधूरी बातें और बहुत सारी खामोशियाँ। वो ज़्यादा बोलती नहीं थी, लेकिन उसकी आँखें बोलती थीं — और मैं हर बार उन्हीं में खो जाता।
एक दिन मैंने हिम्मत करके पूछा, “आप रोज़ यहाँ क्यों आती हैं?”
वो मुस्कुराई, और बोली, “क्योंकि यहाँ की खामोशी में शोर नहीं है… बस सुकून है।”
उसका जवाब सीधा दिल में उतर गया। शायद इसलिए क्योंकि मैं भी वही ढूंढ रहा था — सुकून।
वो कहती थी कि ज़िंदगी बहुत छोटी है, उसे महसूस करने का वक्त मिलना चाहिए। मैं कहता था कि कुछ एहसास ऐसे होते हैं जो वक्त नहीं माँगते, वो बस दिल में बस जाते हैं। और शायद हमारा रिश्ता भी ऐसा ही था — बिना किसी नाम का, बिना किसी दावे का, मगर बहुत गहरा।
बरसात का मौसम था जब पहली बार उसने अपना मन खोला। उसने बताया कि वो अपने अतीत से भाग रही है — कुछ ऐसा जो उसने कभी किसी को नहीं बताया। उसकी आँखों में आँसू थे, मगर चेहरे पर मुस्कान। उसने कहा, “मैं किसी से वादा नहीं करती, क्योंकि मुझे वादे तोड़ना नहीं आता।”
मैंने बस इतना कहा, “कुछ रिश्तों को वादों की ज़रूरत नहीं होती।”
उसने मेरी ओर देखा, जैसे पहली बार सच में देखा हो। उस पल लगा जैसे ज़िंदगी वहीं थम गई हो — दो अनजाने, जो शायद हमेशा के लिए एक-दूसरे के हो गए।
दिन बीतते गए। बारिश कम हुई, मगर हमारी बातें बढ़ती गईं। अब हम एक-दूसरे की आदत बन चुके थे। कभी वो अपने सपनों के बारे में बताती, कभी मैं अपने डर साझा करता।
लेकिन हर खूबसूरत कहानी की तरह, हमारी कहानी में भी एक साया था — वो अनकहा डर कि कहीं ये सब खत्म न हो जाए।
एक दिन वो नहीं आई। मैं इंतज़ार करता रहा। कॉफी ठंडी हो गई, मगर दरवाज़े की घंटी नहीं बजी। अगले दिन, फिर वही हुआ। तीसरे दिन, भी वही सन्नाटा।
चौथे दिन, कैफे वाले ने मुझे एक लिफ़ाफ़ा दिया।
अंदर उसकी लिखावट थी —
“अर्जुन, कभी बारिश हो तो समझ लेना, मैं आसमान से तुम्हें देख रही हूँ।
कुछ रिश्ते मुकम्मल नहीं होते, मगर उनकी यादें हमेशा ज़िंदा रहती हैं।
मुझे जाना होगा, शायद हमेशा के लिए। मगर तुम मत रुकना… ज़िंदगी तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।”
मैंने वो चिट्ठी कई बार पढ़ी। हर बार लगा जैसे उसके हर शब्द में कोई अनकही पुकार है। मैं कुछ समझ नहीं पाया — बस इतना कि वो अब नहीं आने वाली।
दिन महीनों में, और महीने सालों में बदल गए। मगर वो मौसम नहीं बदला। जब भी बारिश होती है, मैं उसी कैफे की खिड़की के पास बैठ जाता हूँ। कॉफी का हर घूंट उसकी याद दिलाता है। हवा में उसकी हँसी तैरती है।
लोग कहते हैं, वक्त सब ठीक कर देता है। मगर कुछ यादें वक्त के साथ और गहरी हो जाती हैं। सिया की याद मेरे लिए वैसी ही है — जितना दूर जाने की कोशिश करता हूँ, उतना ही पास आ जाती है।
मैंने उसे भूलने की बहुत कोशिश की। नए लोगों से मिला, नई जगहें देखीं, मगर हर भीड़ में उसकी झलक दिख जाती। हर चेहरे में उसकी मुस्कान, हर आवाज़ में उसका नाम सुनाई देता।
कभी-कभी रातों में मैं अब भी वो चिट्ठी पढ़ता हूँ। उसकी लिखावट फीकी पड़ चुकी है, मगर एहसास नहीं। लगता है जैसे वो अब भी मेरे पास बैठी है, धीरे से कह रही है — “कभी बारिश हो तो मुस्कुरा देना, मैं यहीं कहीं हूँ।”
वो एक एहसास बन चुकी है — जो हवा में घुला हुआ है, जो मेरी साँसों में बसता है। मैं अब जान चुका हूँ कि कुछ लोग भले चले जाते हैं, मगर उनका होना कभी खत्म नहीं होता।
अब मेरी ज़िंदगी का हर मौसम उसके नाम है —
चाहे गर्मी की तपिश हो, या सर्द हवाओं की ठंडक —
हर बार जब आसमान में बादल घिरते हैं, तो दिल में वही पुरानी धड़कन लौट आती है।
लोग कहते हैं, आगे बढ़ो, मगर कैसे बढ़ूँ जब मेरा अतीत ही मेरी पहचान बन गया है?
मैं अब भी उसी कैफे में बैठता हूँ, उसी जगह, वही कप कॉफी — बस सामने की कुर्सी खाली रहती है।
कभी-कभी हवा का एक झोंका आता है, कॉफी की खुशबू के साथ —
और मैं महसूस करता हूँ कि वो आई थी… कुछ पल के लिए ही सही, मगर आई थी।
कहानी का अंत नहीं हुआ है, क्योंकि कुछ रिश्ते ख़त्म नहीं होते —
वो बस तेरी यादों के मौसम में बदल जाते हैं।
To Be Continued…
