तेरी यादों का मौसम
कहते हैं वक्त हर दर्द को मिटा देता है, लेकिन कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो वक्त के साथ और गहरे उतरते जाते हैं। सिया के जाने के बाद मेरी ज़िंदगी जैसे रुक सी गई थी। लोग मुझे समझाते रहे — “अर्जुन, वक्त सब ठीक कर देगा।” लेकिन मैं हर दिन उसी जगह लौट आता जहाँ आख़िरी बार उसने मेरी तरफ़ देखा था।
बारिश अब भी वैसी ही होती थी — वही खुशबू, वही ठंडी हवा, वही अधूरापन। फर्क बस इतना था कि अब वो मेरे सामने नहीं बैठी थी।
मैंने कोशिश की ज़िंदगी में वापस लौटने की। नौकरी बदली, शहर बदला, यहाँ तक कि घर की दीवारों पर लगे पुराने फ्रेम तक हटा दिए, लेकिन उसके नाम की गूंज अब भी बाकी थी। हर बार जब कोई दरवाज़ा खुलता, लगता वो लौट आई है।
साल बीतते गए। सिया की चिट्ठी अब भी मेरे बटुए में रखी थी, इतनी पुरानी कि किनारे झड़ने लगे थे, पर लफ़्ज़ अब भी वैसे ही जिंदा थे।
“कभी बारिश हो तो समझ लेना, मैं आसमान से तुम्हें देख रही हूँ…”
हर बार जब बारिश होती, मैं आसमान की ओर देखता, शायद उम्मीद करता कि कहीं से उसकी हँसी सुनाई दे जाए।
लेकिन एक दिन, एक अजनबी मुलाक़ात ने मेरी दुनिया फिर बदल दी।
वो ठंडी शाम थी। मैं शहर की नई लाइब्रेरी में बैठा किताबें देख रहा था। अचानक एक आवाज़ आई —
“माफ़ कीजिए, ये किताब आप पढ़ रहे हैं?”
मैंने मुड़कर देखा। एक लड़की खड़ी थी — शायद उम्र में सिया से कुछ साल छोटी, पर चेहरे पर वही सादगी, वही ठहराव।
मैंने सिर हिलाया, “नहीं, आप ले लीजिए।”
वो मुस्कुराई — और उस मुस्कान में मुझे सिया की परछाई दिखी।
“आप अर्जुन हैं न?” उसने पूछा।
मैं चौंका, “आप मुझे जानती हैं?”
वो बोली, “मैं सिया की बहन हूँ — अनाया।”
उस वक्त लगा जैसे किसी ने ज़मीन खींच ली हो मेरे नीचे से। मैं बस खड़ा रह गया — चुप, सुन्न, और यादों में डूबा।
उसने कहा, “दीदी ने आपके बारे में बताया था… बहुत कुछ।”
मैंने उसकी आँखों में देखा — वही सिया की झलक, वही अपनापन।
“वो कैसी हैं?” मेरे मुँह से अनजाने में निकल गया।
अनाया की आँखें नम हो गईं। उसने धीरे से कहा, “दीदी… अब नहीं हैं।”
मेरे अंदर कुछ टूट गया। मैंने कुछ नहीं कहा, बस बाहर बारिश शुरू हो गई थी — वही मौसम, वही गंध, वही सन्नाटा।
अनाया ने एक छोटा डिब्बा मेरी ओर बढ़ाया — “ये उन्होंने आपके लिए छोड़ा था।”
मैंने कांपते हाथों से डिब्बा खोला। अंदर एक पुरानी चिट्ठी थी और एक सूखा हुआ गुलाब — वही गुलाब जो मैंने उसे पहली बारिश में दिया था।
उस चिट्ठी में लिखा था —
“अर्जुन, जब ये खत तुम्हें मिले, मैं शायद बहुत दूर जा चुकी होऊँ।
कभी सोचा नहीं था कि ज़िंदगी इतनी छोटी होगी।
मैंने तुम्हें इसलिए नहीं छोड़ा था कि मैं तुम्हें भूलना चाहती थी… बल्कि इसलिए कि तुम मुझे याद रख सको।
तुम्हारे बिना मैं अधूरी थी, पर तुम्हारे साथ रहकर शायद तुम्हें भी अधूरा कर देती।
इसलिए चली गई… ताकि तुम्हारी यादों में मैं हमेशा ज़िंदा रह सकूँ।”
मैंने वो खत सीने से लगा लिया। बाहर बारिश और तेज़ हो चुकी थी, और मैं समझ गया — तेरी यादों का मौसम कभी खत्म नहीं होगा।
अनाया मेरे पास बैठी थी। उसने कहा, “दीदी आपको बहुत चाहती थीं, अर्जुन। वो रोज़ आपकी डायरी के बारे में बात करती थीं। उन्होंने कहा था, अगर कभी तुम अकेले महसूस करो, तो मेरी कहानी किसी को सुनाना… ताकि हमारा प्यार जिंदा रहे।”
वो दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे भारी दिन था। मगर उसी दिन मैंने पहली बार लिखा — सिया की याद में।
मैंने एक ब्लॉग शुरू किया — “तेरी यादों का मौसम।”
हर हफ्ते मैं उसकी यादों को शब्दों में ढालता — हमारी पहली मुलाक़ात, हमारी खामोशियाँ, हमारी अधूरी बातें।
लोग पढ़ते, रोते, लिखते — “किसी ने इतना सच्चा प्यार किया भी कैसे?”
मगर उन्हें क्या पता था, ये कहानी मेरी ज़िंदगी थी, कोई कल्पना नहीं।
धीरे-धीरे उस ब्लॉग ने लोगों के दिलों में जगह बना ली। मुझे हर हफ्ते सैकड़ों मेल आते — किसी ने अपने बिछड़े प्यार को याद किया, किसी ने सिया जैसे किसी को खोया।
हर मेल में मुझे सिया की झलक दिखती — वो अब भी लोगों के दिलों में थी, मेरी कलम के ज़रिए।
साल गुज़रते गए। मैं अब बूढ़ा हो चुका हूँ। बालों में सफेदी है, मगर दिल में वही बारिश वाला मौसम बसता है।
लोग पूछते हैं — “अर्जुन, आपने शादी क्यों नहीं की?”
मैं बस मुस्कुरा देता हूँ — “क्योंकि मेरी ज़िंदगी की किताब का आख़िरी पन्ना उसी के नाम लिखा गया था।”
अब भी जब आसमान में बादल घिरते हैं, मैं उस पुराने कैफे के पास जाता हूँ। वहाँ अब नया बोर्ड लगा है, नई कुर्सियाँ हैं, मगर वो खिड़की अब भी वही है।
मैं वहाँ बैठता हूँ, एक कप कॉफी ऑर्डर करता हूँ, और खिड़की से बाहर देखता हूँ।
एक बार हवा का झोंका आया, और लगा जैसे किसी ने मेरा नाम पुकारा — “अर्जुन…”
मैंने पलटकर देखा, कोई नहीं था। मगर दिल ने कहा — “वो आई थी।”
कभी-कभी सोचता हूँ, अगर सिया आज होती तो क्या होता? शायद हम अब भी उसी कैफे में बैठते, कॉफी पीते और खामोश रहते — क्योंकि हमारी खामोशियाँ ही हमारी भाषा थीं।
पर शायद किस्मत को यही मंज़ूर था — कि हम एक-दूसरे की ज़िंदगी में रहकर भी, ज़िंदगी से दूर रहें।
अब मेरी साँसों में सिया की खुशबू घुली हुई है। जब भी पत्तों पर पहली बूंद गिरती है, मैं उसकी मुस्कान महसूस करता हूँ।
वो अब भी यहीं है — हवा में, बारिश में, कॉफी की महक में, और मेरे शब्दों में।
मेरी ज़िंदगी अब किसी इंतज़ार का नाम नहीं रही,
बल्कि किसी एहसास का नाम बन गई है — वो एहसास जो खत्म होकर भी कभी खत्म नहीं होता।
कभी-कभी रात के सन्नाटे में, मैं अपनी पुरानी डायरी खोलता हूँ — वही जिसमें कभी सिया के नाम की शुरुआती पंक्तियाँ थीं। अब उसमें बस एक आख़िरी पंक्ति लिखी है —
“मोहब्बत अगर सच्ची हो, तो जुदाई भी एक रूप होती है मिलन का।
सिया, तेरी यादों का मौसम आज भी मेरे दिल में बरसता है…”
उसके बाद मैं अपनी खिड़की बंद करता हूँ, कॉफी का कप खाली रख देता हूँ — ताकि जब वो लौटे, तो उसके लिए भी जगह रहे।
क्योंकि मुझे यकीन है, वो कभी न कभी लौटेगी — शायद किसी और जन्म में, शायद किसी और बारिश में।
लेकिन तब तक, मैं ज़िंदा रहूँगा उसकी याद में,
उसकी मुस्कान की परछाई में,
और उस मौसम में जो कभी ख़त्म नहीं होगा —
तेरी यादों का मौसम।
